Monday, April 6, 2020

शायद अब कहीं सांस आया है

गंदे नालों से भी बद्तर हो गई थी यमुना,

हम रुके तो इसे सांस आया है।।

धुंआ-धुंआ हो गई थी दिल्ली,

अब जाकर इसे सांस आया है।।

जिंदगी भागती सी नजर आती थी, 

अभी कुछ देर की लिए ही सही

पर हम  ठहरे तो इसे सांस आया है।।

समझ नहीं आता था धुंआ है या धुंध,

शायद अब जाकर कहीं सांस आया है।।

 दूर भागते थे घर से परिवार से,

अब अकेले पड़े तो दूर के रिश्तों को भी सांस आया है।।

सांस उखड़ी उखड़ी  सी रहती थी सबकी,

अब फुरसत से सांस आया है।।

मच्छरों के सिवा कुछ ना दिखता था,

अब तो परिंदो को भी सांस आया है।

धीरे-धीरे बदरंग  सी हो रही थी जिंदगी,

शायद अब फिर से कुछ रंग भर जाए।।

बच्चा बच्चा खांसता दिखता था मुझे,

आज बूढ़ी अम्मा को भी सांस आया है।।